करुणाहीन समाज की मर्यादाहीन संतानें

भारत के 80 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से देश और दुनिया को संबोधित करते हुए  प्रधानमंत्री यह दावा कर रहे हैं कि 2014 से पहले जहां दुनिया ने भारत को लड़खड़ाते देश के रूप में डंप कर रखा था वहीं अब दुनिया भारत को नई उम्मीद के साथ देख रही है। क्योंकि भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गया है। लेकिन दूसरी ओर भारत का लोकवृत्त यानी पब्लिक स्फेयर इस बात से पटा पड़ा है कि हर क्षेत्र में हमारी मर्यादाएं टूट रही हैं।

संसद से सड़क तक, संचार माध्यमों से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक भाषा और भाव विकृत हो रहे हैं। धर्म से राजनीति तक हर क्षेत्र में लोग बुनियादी मूल्यों को भुला बैठे हैं। जब लोग अपने ही धर्म का ठीक से आदर नहीं कर रहे हैं तो दूसरे धर्मों और दूसरे दलों का आदर करने की बात तो जाने ही दीजिए। 22 जनवरी 2024 को जब अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ तब यही दावा किया गया था कि देश में रामराज्य का सपना साकार हो रहा है।

लेकिन यह बात शायद ही किसी को स्मरण रही कि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। वे कृष्ण की तरह से मर्यादाएं तोड़ते नहीं उसे कायम करते हैं। उनका व्यक्तित्व स्वच्छंद नहीं संयमित है। इसलिए जिन्हें भी राजनीतिक सत्ता मिली है उन्हें नई मर्यादाएं कायम करनी हैं न कि स्वतंत्रता दिवस की मर्यादाएं तोड़नी हैं।

लेकिन राम की मर्यादाओं के आधार पर हमने जिस रामराज्य की कल्पना की थी वह तो कहीं दिख नहीं रहा है। राजनीतिक दलों के बीच संवाद की भाषा बिगड़ रही है। यह सही है कि भाषा को बिगाड़ने का जो खेल 12 साल पहले संघ परिवार ने शुरू किया था आज उसे उसी भाषा में प्रतिउत्तर प्राप्त हो रहा है। इसलिए वे लोग तिलमिलाए हुए हैं। वह प्रतिउत्तर कहीं युवाओं की ओर से मिल रहा है तो कहीं विपक्षी दलों की ओर से।

भाजपा के प्रचार तंत्र और विशेषकर आईटी सेल को यकीन था कि वह कभी साधु संतों के माध्यम से, तो कभी आईटी सेल के युवा गालीबाजों के माध्यम से, अपने आलोचकों पर हमला करेगी और कोई उस भाषा में जवाब नहीं दे पाएगा। क्योंकि सरकारी तंत्र उनके हमले को तो रोकेगा नहीं लेकिन दूसरे पक्ष के हमलों को या तो कानूनों से रोक देगा या बाकी समाज को उसे अस्वीकार करने के लिए तैयार कर लेगा। 

लेकिन वह पब्लिक स्फेयर यानी लोकवृत्त जहां एक दूसरे से खुलकर संवाद होते थे वे फिर से जाग रहे हैं। वे चीजें 12 सालों के दौरान पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई थीं लेकिन उन्हें मुख्यधारा से समाप्त कर दिया गया था और समय समय पर प्रतिपक्ष की वाणी को संसद से लेकर सड़क तक सेंसर किया जाता था।

1962 में जब जर्मन दार्शनिक जुरगेन हैबरमास ने ‘स्ट्रक्चरल ट्रांसफार्मेशन आफ पब्लिक स्फेयर’ जैसा ग्रंथ लिखकर यह समझाने की कोशिश की थी कि जनमत निर्माण के लिए कॉफी हाउस, सैलून और सार्वजनिक पत्रिकाओं ने किस तरह अहम भूमिका निभाई। उन्होंने यह भी बताया कि मास मीडिया के उभार ने जनमत निर्माण को एक किस्म का पीआर और कॉरपोरेट का धंधा बना दिया।

जुरगेन हैबरमास का मार्च 2026 में 97 साल की आयु में निधन हो गया, लेकिन आज अगर वे होते तो यह देखकर बहुत प्रसन्न होते कि भारत में मास मीडिया और कॉरपोरेट पीआर के बाहर पब्लिक स्फेयर फिर से जिंदा हो रहा है।

आज भारत में लोग सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना ट्रेनों, बसों, सार्वजनिक स्थलों और तमाम यूट्यूब चैनलों पर कर रहे हैं और एक दूसरे को चुप कराने या उन पर शारीरिक हमला करने की प्रवृत्तियां कम हुई हैं। यहां तक कि सरकारों में बैठे लोगों की संतानें भी अपने परिवार से विद्रोह करके सरकारों की आलोचनाएं कर रही हैं उनके विरुद्ध प्रदर्शन कर रही हैं।

काकरोच जनता पार्टी का आंदोलन भले साइबर जगत से प्रकट होकर जंतर मंतर के बहाने धरती पर उतरा लेकिन अब वह अपने विमर्शों से पूरे देश और दुनिया को झकझोर रहा है। जवाबदेही की यह मांग अब यह नहीं देख रही कि आप बड़े पद पर हैं और आप से सवाल क्यों किया जाए। बल्कि जो जितने बड़े पद पर हैं उससे उतने ही सवाल पूछे जा रहे हैं। वैसे कुछ लोग जेन जी में जाति और वर्ग की संरचना न पाकर निराश हैं और उसे महज फौरी बुलबुला बताकर खारिज कर रहे हैं और उसे पूंजीवाद का नया औजार बता रहे हैं।

भले ही उनके पास मजदूर और किसान आंदोलन को फिर से खड़ा करके देश की राजनीति को बदलने की कोई सैद्धांतिक और व्यावहारिक योजना का नितांत अभाव है। और उनके पास कोई समाजवादी योजना भी नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री ने संभवतः ऐसे ही सवाल पूछने वालों और सुधार की मांग करने वाले लोगों के लिए लाल किले से यह कहा है कि हथियारी नक्सल तो गए यह दिमागी नक्सल मौके की तलाश कर रहे हैं। दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। 

निश्चित तौर पर इस आंदोलन की भाषा किसान आंदोलन और मजदूर आंदोलनों जैसी मर्यादित नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या पिछले तीन चार दशकों में इस देश में चले धार्मिक आंदोलनों की भाषा मर्यादित रही है। दरअसल मर्यादा का जन्म मानवीय करुणा से होता है। वही करुणा जिसे गांधी अहिंसा और प्रेम का समानार्थी बताते हैं। गांधी प्रेम शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं करते क्योंकि लोक में उसका अर्थ महज रोमांस से लिया जाता है। वरना प्रेम, अहिंसा और करुणा में कोई अंतर नहीं है।

करुणा का यह रूप सबसे चमकदार तरीके से बुद्ध के ब्रह्मविहार नामक सिद्धांत में दिखाई पड़ता है। ब्रह्मविहार यानी श्रेष्ठ निवास अर्थात मन की चार श्रेष्ठ अवस्थाएं। इन चार अवस्थाओं के रूप हैः—मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा। मैत्री का मतलब सिर्फ मनुष्य का मनुष्य से मैत्री भाव रखना नहीं है। बल्कि समस्त प्राणियों के प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखना है।

दूसरी अवस्था है करुणा यानी दुखी और पीड़ित को देखकर उसके कष्टों को दूर करने की इच्छा। तीसरी अवस्था है मुदिता यानी दूसरों की सफलता, सुख और आनंद को देखकर प्रसन्न होना। चौथी स्थिति है उपेक्षा यानी सुख और दुख लाभ हानि और हर परिस्थिति में मन का संतुलन बनाए रखना।

प्रश्न है कि क्या संघ परिवार ने अपनी अखंड सत्ता के 12 साल और स्थापना के सौवें साल में इस प्रकार की किसी अवस्था को अपने नागरिकों को प्रदान करने की स्थिति की बनाई है। बल्कि वे इसकी विपरीत दिशा में समाज को ले गए हैं। इसलिए बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। वे सोचते हैं कि मर्यादित आचरण डराकर और चिढ़ाकर पैदा किया जा सकता है। यह सोचना मानव स्वभाव के एकदम विपरीत है। मर्यादित आचरण ऊपर से थोपे नहीं जाते। वे भीतर से उत्पन्न होते हैं।

मानव कुछ समय के लिए भय के वातावरण में रह सकता है लेकिन मौका मिलते ही उससे बाहर निकलता है। कोई जरूरी नहीं वह हिंसा और घृणा की अवस्था से निकलकर तुरंत ब्रह्म विहार की स्थिति में उतर जाए। पर वह वहां से निकल रहा है और निकलते समय वह अमर्यादित भी हो सकता है। उसकी भाषा उच्छृंखल हो सकती है। आक्रामक भी हो सकती है। लेकिन अगर उसके मानस में करुणा और मैत्री का भाव किसी रूप में है तो वह जरूर समय के साथ मर्यादित हो जाएगा।

भारत ने विगत डेढ़ दशक में दंभ और क्रूरता की भाषा को बहुत भीतर तक झेला है। आज युवा उस केंचुली को उतारने में लगा है। जबकि शक्तिशाली लोग यह चाहते हैं कि हम जिसे चाहें कोसते रहें और हमें सब पूजते हैं। शायद यह स्थिति अब बदल रही है। कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा सुखद बदलाव महज प्रौद्योगिकी के कारण हो रहा है लेकिन उनका यह सोचना सही नहीं है। इस बदलाव में प्रौद्योगिकी सहायक हो रही है लेकिन इस बदलाव के पीछे असली कारण मानव स्वभाव है।

भारत ने अपने स्वतंत्रता आंदोलन के माध्यम से मानव स्वातंत्रय को नई परिभाषा दी है। वह परिभाषा मास मीडिया और कॉरपोरेट पीआर के माध्यम से विकृत हो रही थी। आज वह नए जोश और जज्बे के साथ जागृत हो रही है। ‘भारत बोध’ की बात करने वाले करुणा और मैत्री से निर्मित भारत के इस ‘स्व’ को ना पहचानने की भूल कर रहे थे।

आज का जेन जी भले अमेरिका, यूरोप से लौट कर आया हो लेकिन वह भारत के इसी ‘स्व’ की ओर लौट रहा है जहां पर करुणा की प्रधानता है। उसके सरोकार सिर्फ अपने और अपने संगठन के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क के लिए हैं। इंतजार कीजिए जब करुणा लौटेगी तो मर्यादा भी लौटेगी।    

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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